सांमतवाद का पतन और पूंजीवाद का प्रारंभ

सांमतवाद का पतन और पूंजीवाद का प्रारंभ


1.1 प्रस्तावना
1.2 उद्देश्यः
1.3 सांमतवाद का पतन
1.4 सामंतवाद के पतन के कारण
1.4.1 सांमतों के मध्य अविराम युद्धों की श्रृंखला
1.4.2 नये हथियारों का अविष्कार
1.4.3 किसान विद्रोह
1.4.4 व्यापार की भूमिका
1.4.5 मुद्रा-व्यवस्था का उदय
1.4.6. प्रौद्योगिकी और भूमि तथा श्रम की उत्पादकता
1.4.7. जनसंख्या में वृद्धि
1.4.8. पुनर्जागरण और धर्मसुधार
1.5 सारांश
1.6 शब्दावली
1.1 प्रस्तावना
फ्युडल‘ (सामंती) शब्द की उत्पत्ति लैटिन शब्द फियाडेलिस ;थ्मवकंसपेद्ध से हुई है परंतु मध्ययुगीन यूरोप में इस शब्द का प्रयोग कानूनी अर्थ में किया जाता था। सामंतवादशब्द का प्रचार मुख्यतया 18वीं शताब्दी के फ्रांसीसी दार्शनिक बूलैंवीयै ;ठवनसंपनअपससपमतेद्ध और मौन्टेसक्यू डवदजमेुनपमनद्ध के द्वारा किया गया। इस शब्द का प्रयोग मध्ययुग के दौरान छोटे-छोटे राजकुमारों और अधिपतियों की संप्रभुता में साझेदारी को व्याख्यायित करने के लिए कर रहे थे। कुल मिलाकर सामंतवाद एक राजनीतिक ढाॅचा या सामाजिक स्वरूप है जो 9वीं शताब्दी और 13वीं शताब्दी के बीच पश्चिमी और मध्य यूरोप में एक महत्त्वपूर्ण प्रणाली के रूप में मौजूद थी। जिस प्रकार से सामंतवाद के विकास का एक लंबा एवं जटिल इतिहास रहा है उसी प्रकार इसका पतन भी एक लंबी प्रक्रिया के तहत हुआ। सांमतवाद का पतन इतिहासकारों के बीच एक विवाद का प्रश्न रहा है। विद्वानों का मानना है कि 14वीं शताब्दी में सामंतवाद का धीरे-धीरे पतन होने लगा और कुछ समय बाद यूरोप से यह व्यवस्था समाप्त हो गई। कुछ विद्वानों का मानना है कि व्यापार के फिर से उभरने और विकसित होने तथा फलस्वरूप नगरों का विकास सामंतवाद के पतन का मुख्य कारण था। अन्य विद्वानों का प्रौधोगिकी का स्तर, कृषि में उत्पादकता, जनसंख्या संबधी बदलाव और ग्रामीण परिदृश्य में परिवर्तन जैसे अन्य मुद्दे सामंतवाद के पतन के लिए जिम्मेदार थे।
1.2 उद्देश्य
प्रस्तुत अध्याय को पढ़ने के बाद आप यूरोप में सांमतवाद के पतन की प्रक्रिया को जान सकेंगे। इसमें व्यापार की भूमिका को समझ सकेगें। पुनर्जागरण एवं पूॅंजीवाद का उत्थान कैसे सांमती ढाॅचा को नष्ट किया।
1.3 सांमतवाद का पतन
13वीं शताब्दी यूरोप में मध्यकाल का चरमोरकर्ष माना जाता है, किंतु इसी शताब्दी के अंतिम वर्षो में कुछ ऐसी नवीन प्रगतिशील शक्तियों का उदय हो रहा था जो मध्यकालीन व्यवस्था के पतन और नये युग के आगमन का संकेत दे रही थी। 14वीं एवं 15वीं शताब्दी में प्रायः उन सारी शक्तियों का विघटन हुआ जो मध्यकालीन व्यवस्था की मुख्य विशेषताएॅ थी। ये विशेषताएॅ थी - राजनीतिक सत्ता का विखंडीकरण, निजी लोगों के हाथों में सार्वजनिक शक्ति एवं एक ऐसी सैन्य व्यवस्था जिसमें सैन्य शक्ति निजी हाथों में ठेके पर दे दी गई है, इत्यादि। मध्यकालीन संस्थाओं के विघटन के साथ-साथ नए आदर्शो और संस्थाओं का उदय हो रहा था। ये दो सदिया अंशतः मध्यकालीन और अशंतः आधुनिक साबित हुई। इन दोनों शताब्दियों में कुछ विशिष्ट मध्यकालीन संस्थाओ जैसे बड़े-बड़े साम्राज्य, विश्वव्यापी धर्म, गिल्डों के अधिकार, मैनोरियल व्यवस्था और रूढ़िवाद के पतन के गर्त में गिरते देखते हैं। लगभग हर स्थिति में मध्यकालीन संस्थाएॅ नवजागृत प्रगतिशील शक्तियों को नियंत्रित करने या रोकने में सक्षम रही। मध्यकालीन व्यवस्था के केन्द्र में सामंतवादी व्यवस्था थी और इसका पतन संपूर्ण मध्यकालीन व्यवस्था के पतन की व्याख्या करता है।
1.4 सामंतवाद के पतन के कारण
1.4.1 सांमतों के मध्य अविराम युद्धों की श्रृंखला
 सामतं प्रथा की एक बडी़ कमजोरी यह थी कि सांमत बराबर आपस में लड़ते रहते थे। इनके कारण धन-जन की काफी क्षति होते गया। 200 वर्षों के धर्मयुद्ध में बहुत सारे सामंत मारे गये। इस युद्ध का अंत होते-होते इंग्लैड़ और फ्रांस के सामंतों के बीच लड़ाई छिड़ गई जो लगभग 100 वर्षो तक चली। इसमें अनेक सांमत मारे गए। फिर 15वीं सदी में इंग्लैड के गुलाबों के युद्ध से भी वहा के सामंतवर्ग को बड़ी क्षति पहुची। यह बड़ा भीषण युद्ध था, क्योंकि इसके द्वारा प्रतिद्वन्द्वी सांमतों के दल इंग्लैंड के शासनतंत्र को अपनी-अपनी मु में लाना चाहते थे। एक ओर इन्होंने आपस में लड़कर अपनी शक्ति बर्बाद की तो दूसरी ओर इन्हांेने राजाओ को सामंती मामलो में हस्तक्षेप करने का मौका दिया। इन सामंती युद्धों के कारण यूरोप में हिंसा, अव्यवस्था और उपद्रव का वातावरण पैदा हुआ। फलतः सामान्य लोगों में सांमतों के प्रति घृणा और उब की भावना पैदा हुई। इसी परिवेश में कानून-व्यवस्था के स्थानापन्न के रूप में शक्तिशाली केन्द्रीय सरकार की आवश्यकता महसूस की जाने लगी। फलतः राष्ट्रीय-राज्यों के उदय का मार्ग प्रशस्त होने लगा। अगर इंग्लैंड में यार्क और लंकाशायर वंश के सांमत आपस में नही लड़ते तो वहाॅ ट्यूडर निरकुंशतंत्र का उदय नहीं होता।
1.4.2 नये हथियारों का अविष्कार
एक ओर तो लगातार हो रहे युद्धों के कारण सामंतांे की संख्या घटती जा रही थी और दूसरी ओर नए हथिआरों के आविष्कार के कारण उनका सामाजिक एवं सामरिक महत्त्व भी घट रहा था। घुड़सवार सामंत अपने भाले, बर्छे और तलवारों से लड़ते थे और इस कारण वे युद्ध में कुशल समझे जाते थे। अब लंबे धनुष का प्रचलन आरंभ हुआ। इससे तीरंदाज किसान भी घुड़सवार सामंत का मुकाबला करने लगा और सामाजिक दृष्टि से अब
नाइट की पुरानी प्रधानता जाती रही। इन सामतं ों की सामरिक प्रधानता का दूसरा कारण था कि वे अपने दुर्भेध किलों में रहकर अपनी सुरक्षा
आसानी से करते थे, किंतु मंगोल यूरोप में सबसे पहले बारूद लाये और अरब युद्ध में बारूद के गोलों का व्यवहार होने लगा। गोला-बारूद द्वारा सामंती किलों पर दखल जमाना आसान हो गया, इसलिए अब सामंती किले की दुर्भेधता जाती रही। मध्य युग के अंत में बंदुकों का व्यवहार होने लगा। पहले इसका व्यवहार जर्मनी में हुआ और गुलाबों की लड़ाई में इंग्लैंड में एडवर्ड चतुर्थ ;प्टद्ध के भाड़े के सिपाहियों ने इसका प्रयोग किया। बंदुकों के कारण पैदल सेना प्रमुख सेना बन गई और पुराने ढंग की घुड़सवार सेना का महत्त्व जाता रहा। सामंतो को दबाने के लिए राजा पैदल सेना का संगठन करने लगा और उनके लिए बंदुक और बारूद जुटाने लगा। इसके लिए पैसे की आवश्यकता थी और पैसे शहरी व्यापारियों के पास थे। सामंतो के विरोधी व्यापारी ने पैसे से राजा का हाथ मजबूत किया जिससे सामंती व्यवस्था को धक्का लगा।
1.4.3 किसान विद्रोह
सामतों के पतन का एक प्रमुख कारण था किसानों का विद्रोह। कृषि अधिशेष का सामंतो के द्वारा अधिक दोहन का बुरा असर किसानों पर पड़ा। छोटे एवं मध्यम किसान भी इससे प्रभावित हुए क्योंकि अधिशेष दोहन के दर में वृद्धि से उनके पास मुश्किल से कुछ बचता था। एम.एम. पोस्टन के अनुसार सामंती कुलीन वर्ग के द्वारा आश्रित किसानों से कुल उपज का आधा भाग ले लिया जाता था। इसके साथ-साथ लगातार कृषि के कारण भूमि की उर्वरकता भी कम होती जा रही थी क्योंकि उर्वरकता हासिल करने के लिए किसान जमीनों को बहुत दिनों तक परती नहीं छोड़ सकते थे। साथ ही किसानो की सीमित आय के कारण उन्नत बीज, उर्वरक और तकनीक पर खर्च नहीं करते सकते थे। परिणामस्वरूप कृषि उत्पादन में गिरावट दर्ज हुआ और खाद्य पदार्थो के असमान वितरण और आबादी में लगातार वृद्धि के कारण संकट को जन्म दिया। साथ ही साथ सामंती वर्ग केद्वारा कृषि के क्षेत्र में कोई रूचि का न लेना तथा भोग विलास में ज्यादा खर्च करना भी महत्तवपूर्ण भूमिका निभा रहा था। रोडनी हिल्टन ने अनुमान लगाया कि सामंतो के द्वारा कुल आय का मात्र पाच प्रतिशत उत्पादन में निवेश किया जाता था बाकि गैर उत्पादक मदों में।उपरोक्त वर्णित परिस्थितियों के कारण 14वीं सदी के शुरू में पूरे यूरोप में कृषि मूल्यों में काफी बढ़ोती हुई। इससे ग्रामीण तथा शहरी वर्ग दोनों प्रभावित हुआ। खाद्य पदार्थो में हो रहे लगातार वृद्धि के कारण 14वीं सदी के पूर्वार्द्ध में अकाल पड़ने लगे थे। 1315-16 का अकाल काफी भयंकर था। अकालों के कारण आबादी में गिरावट हुआ। इसके अलावा, 1347 में पूर्वी यूरोप में प्लेग की महामारी फैल गई और 1348 तक पश्चिमी यूरोप में फैल गया। महामारी का यह श्रृंखला 1350-51 तक चला। इसे यूरोप में काली मौतके नाम से जाना जाता है। इसमें यूरोप की एक चैथाई आबादी नष्ट हो गई। 14वीं सदी के अंत तक यूरोप की आबादी में 40 तक गिरावट दर्ज हुआ। पश्चिम में आश्रित किसानों ने 14वीं सदी के इस संकट का मुकाबला सामंती करों के बढ़ते बोझ के खिलाफ प्रतिरोध करके किया। अधिकांश किसानों के विद्रोह स्वतःस्फूर्त और व्यक्तिगत थे। किसान शुल्क अदा करने से मना करके दूसरी जगह भाग जाते। आगे चलकर बड़ी संख्या में यह विद्रोह संगठित किसान विद्रह हुए जिससे सामंतो का अधिकार भूदासों पर कमजोर हुआ। 1320 के दशक में फ्रांस, बल्जियम, इंग्लैंड आदि क्षेत्रों में अनेक किसान विद्रोह हुए। सर्वाधिक महत्वपूर्ण विद्रोह 1358 में फ्रांस में हुआ जिसे ग्रैंड जैकरी के नाम से जाना जाता है।
1.4.4 व्यापार की भूमिका
बेल्जियम इतिहासकार हेनरी पिरेन ने सामंतवाद के पतन के लिए व्यापार के प्रसार एवं शहरी केन्द्रों के उदय को जिम्मेदार माना है। इन्होने अपनी पुस्तक, ‘मेडिवल सिटीजः देयर आॅरिजिन ऐंड रिवाइवल आफ टोडमें सामंतवाद के पतन में व्यापार की भूमिका को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना हैं। पिरेन के अनुसार लंबी दूरी का व्यापार जिसे वे ‘‘ग्रैंड टेª‘‘ कहते थे, की फिर से पुनरूत्थान हुआ और शहरी केन्द्र उभर आए। इससे लोगों के निजी जिंदगी में परिवर्तन हुआ और व्यक्ति स्वतंत्रता का जीवन को मूल मानने लगा। जर्मनी में यह कहावत प्रचलित हुई कि शहर की हवा लोगों का आजाद बनाती है।वास्तव में व्यापार का वातावरण स्वतंत्रता का वातावरण था और सामंती प्रथा का वातावरण असंतोष और संकीर्णता का। इसलिए दोनों में संघर्ष हाने लगा। शहर के लोगों को भी सामंती सेवाएॅ करनी पड़ती थी जिससे वे मुक्त होना चाहते थे। उदाहरण के लिए उन्हें अपनी जमीन बेचने की स्वतंत्रता नहीं थी, जिससे वे अपनी पूॅंजी को करोबार में लगा सकें। उनके व्यापार संबधी मुकदमों का फैसला भी मैनर की सामंती कचहरियों में होता था। इसके अतिरिक्त इन्हें अपने उद्योग एवं धन्धें और व्यापार में मजदूरों की आवश्यकता थी, किंतु सामंती व्यवस्था दासता के कारण मजदूर जमीन से बॅंधे हुए थे। इन कारणों से भी व्यापारियों और सामंतो के बीच संघर्ष हुआ और व्यापारियों के द्वारा किसान विद्रोही को समर्थन भी मिला।13वीं-15वीं शताब्दी तक सौदागरों के द्वारा अपना संगठन बनाया गया और राजा की सहायता से अपनी मागों को मनवाया भी गया। इससे समंतवाद को बड़ा धक्का लगा। व्यापार में तेजी के पीछे धर्मयुद्ध का भी बड़ा योगदान माना जाता है। इससे भूमध्यसागर का रास्ता मुस्लिमों से निकलकर यूरोपीयों के हाथों में चला गया। परिणामस्वरूप उत्तरी यूरोप और पुरब के बीच व्यापार में तेजी आया। पुराने शहर पुनः उन्नति करने लगे और साथ ही नए शहरों का उदय होने लगा। 15वीं शताब्दी में पेरिस की आबादी तीन लाख, वेनिस की एक लाख, नब्बे हजार, प्राग एवं ब्रुसेल्स की एक लाख और लंदन की आबादी 35000 थी। पिरेन की सामंतवाद और व्यापार के बीच आधारभूत द्विभाजन संबंध को सबसे गंभीर चुनौति माक्र्सवादी इतिहासकार मारिस डाब ने दी। 1946 में उन्होने अपनी पुस्तक स्टडीज इन द डेवेलवपेंट आफ कैपिटलिज्ममें सामंतवाद के पतन में व्यापार की भूमिका को उठाया। उनके अनुसार अपने आप में व्यापार किसी भी आर्थिक व्यवस्था को नहीं बदल सकता है क्योंकि व्यापार के साथ-साथ दास प्रथा, सामंतवाद, पूजीवाद इत्यादि कायम रह सकता है। उन्होने यह भी तर्क दिया कि 17वीं-18वीं शताबदी में पूर्वी यूरोप में व्यापार के पुनरूत्थान से सामंतवादी व्यवस्था का अंत होने के बजाए वहा दूसरी कृषि दासव्यवस्था का जन्म हुआ। इनके अनुसार कृषि दास प्रथा सामंतवाद का प्रमुख लक्षण है। माक्र्सवादी विश्लेषण के तहत डाब ने कहा कि पश्चिमी यूरोप में सामंतवाद के पतन का कारण अंदरूनी संकटथा। इस अंदरूनी संकट को डाब ने सामंती वर्गा एवं किसान वर्ग के बीच के संघर्ष के रूप में व्याख्यायित करते है। डाब शहरों के उदय को भी सामंतवाद के पतन के लिए एक प्रमुख कारण मानते है। परंतु जहा  एक ओर पिरेन इस परिघटना को व्यापार के साथ जोड़कर देखते हैं वहीं दूसरी ओर डाब व्यापार से इसका कोई संबंध नहीं मानते है। अमेरिकी विद्वान पाल स्वीजी ने भी पिरेन की अवधारणा और व्यापार/सामंतवाद के बीच असंगति का समर्थन किया। उनका तर्क है कि सामंतवाद का पतन वाणिज्यिक अर्थव्यवस्था के विस्तार के कारण हुआ। जापान के इतिहासकार कोचरू ताकाहाशी ने यह कहकर बहस को एक नया मोड़ दे दिया कि पूजीवाद का जन्म केवल बुर्जुआ वर्ग के उदय के जरिए सामंतवाद के खंडहरों के ऊपर नही हुआ बल्कि यह राज्य समर्थित पूजीवादी अर्थव्यवस्था का परिणाम था। जापान के संदर्भ में तेजी पुनसर्थापना के बाद पूजीपति वर्ग ने नहीं बल्कि राज्य ने  वहा पूजीवादी अर्थव्यवस्था के उदय में निर्णायक भूमिका अदा की। यदि डाब ने व्यापार और सामंतवाद की संगति के संबंध में विचार रखे तो दूसरे फ्रांसीसी इतिहासकार गी बुआ आगे बढ़कर दोनों का सीधा संबंध को स्थापित किया। डाब के अनुसार सामंतवाद का पतन उत्पादन की सांमतवादी पद्धति के भीतर के अन्तर्विरोधों का परिणाम था। गि बुआ ने अपने लेख में फ्रांस के एक गाव लूर्नांद स्वनतदंदकद्ध का परीक्षण संक्रमण के काल में किया और यह बताया कि व्यापार के विकास से अधिपतियों और किसानों का सांमती गठजोड़ कमजोर होने के बजाए और मजबूत हो गया। पिरेन का यह मानना था कि  मध्यकालीन यूरोप में प्रौद्योगिकी का स्थान निम्न था और भूमि तथा श्रम की उत्पादकता काफी कम थी, से डाब,रोडनी हिल्टन आदि सहमति दर्ज करते है।
1.4.5 मुद्रा-व्यवस्था का उदय
जैसे-जैसे व्यापार की वृद्धि हुई मुद्रा-व्यवस्था का प्रचलन हुआ। सामंती व्यवस्था के आर्थिक आधार में मुद्रा की प्रघानता नहीं थी। किसान वर्ग काम करके एवं सामंतशाह उनसे सेवाए लेकर अपनी जरूरतों को पूरा करते थे। परंतु सिक्कों के प्रचलन से परिस्थितिया बदल गयी। मुद्रा अर्थव्यवस्था में सामंतो ने भूमि को व्यावस्था के रूप में देखना शुरू किया। वे अब अपनी जागीर से अधिक से अधिक मुनाफा चाहने लगे। अतः उन्होने अपनी जमीन की घेराबंदी शुरू की और उस घिरे हुए प्लाट में खेती के नये तरीके अपनाये। उन्होंने महसूस किया किया कि अब खेती में उतने लोगों की आवश्यकता नहीं है, जितने लोग पहले लगाए जाते थे। अतः उन्होने अपनी 6 जागीर ;डंदवतद्ध में संलग्न किसानों को बाहर करना शुरू किया। इस प्रकार से एक ओर मैनोरियल व्यवस्था का अंत हुआ और दूसरी ओर कृषि के व्यावसायीकरण से सामंती मूल्य एवं दृष्टिकोण विखड़ने लगा। मैनर व्यवस्था से मुक्त किसान नए व्यवस्था की खोज में शहर की ओर पलायन करने लगे। इस कारण से मुद्रा-प्रधान अर्थव्यवस्था के कारण ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में एक नई लहर पैदा हुई जो सामंतवाद के विरूद्ध थे। अब  गतिहीन, कृषि प्रधान और सामूहिक सामंती व्यवस्था के स्थान पर एक गतिशील, शहरी, प्रतियोगी और मुनाफा व्यावस्था अर्थव्यवस्था अर्थात् पूजीवाद का उदय हुआ। ऐसी स्थिति में सामंतवाद जीर्ण-शीर्ण और अनुपयोगी साबित होने लगा। धीरे-धीरे यह स्पष्ट होने लगा कि उदयीमान आर्थिक एवं सामाजिक शक्तियों का विकास शक्तिशाली केन्द्रीय सरकार के द्वारा ही हो सकता है। किसान व्यापारी, उद्योगपति, मजदूर, सभी राजा को ही अपना हितचिंतक मानने लगे और उन्होंने व्यापार, उद्योग, खेती तथा सामाजिक संरचना पर केन्द्रीय सरकार के अधिकाधिक नियंत्रण की माग की। इंग्लैंड एवं फ्रांस जैसे देश के राजाओं ने इस चुनौति का स्वीकारा और उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति को नियंत्रित किया। सामाजिक स्तरीकरण ; वबपंस ैजतंजपपिबंजपवदद्धए आर्थिक स्थानीयवाद ;मबवदवउपब सवबंसप्रंजपवदद्ध और निहित स्वार्थो के विभिन्न घटकों पर आधारित सामंतवाद के पतन का संकेत राष्ट्रीय-राज्यों के उदय से मिल रहा था। परिणाम यह हुआ कि पश्चिमी यूरोप के देशों में राजा और व्यापारिक वर्ग (थर्ड स्टेट) के बीच अन्योन्याश्रित संबंध कायम हुआ। पारस्परिक समझौते के द्वारा दोनों सामंतों की रही-सही शक्ति को तोड़ने लगे। अपने देश में एक मजबूत केन्द्रीय (राष्ट्रीय) शक्ति की स्थापना की चेष्टा करने लगे। उदाहरण के लिए, 13890 में इंग्लैड की सरकार ने यह कानून पास किया कि समूचे इंग्लैंड में एक समान माप-तौल चलेगी और जो इसका उल्लंघन करेगा उसे छः महीने की सजा मिलेगी । उसी प्रकार 14390 में फ्रांस के राजा ने एक कानून पास किया कि व्यापारियों को सामंतो के द्वारा ज्यादा लुटने से बचाया जाए। उसी साल फ्रांस में राष्ट्रीय कर जिसे टैली कहते है पहले पहल लगाया गया जो नियमित रूप से सबको पैसे के रूप में देना पड़ता था। अब राजा नियमित रूप से वेतनधारी सेना रखने लगा और राजकर्मचारियों को भी बहाल करने लगा। वह मध्यमवर्ग से जज, मंत्री और नागरिक अधिकारिक को भी भर्ती करने लगा। 15 वीं शताब्दी में फ्रांस के जाकी कोर नामक लियोन शहर का बैंकर अपने समय का बहुत धनी व्यक्ति राजा का मंत्री बना। इस तरह 15वीं शताब्दी का अंत होते-होते इंग्लैड, फ्रांस, बैल्जियम और स्पेन में पूरे के पूरे राज्य एक आर्थिक इकाई बन गए और राजा की प्रधानता कायम हो गयी। स्थानीयता पर आधारित सामंतवाद धाराशायी होने लगा।
1.4.6. प्रौद्योगिकी और भूमि तथा श्रम की उत्पादकता
मध्ययुगीन यूरोप में प्रौद्योगिकी के निम्न स्तर की बात को हेनरी पिरेन तथा मारिस डाब दोनों ने हीसमर्थन किया परन्तु इस बात पर उन्होंने कुछ नहीं कहा कि इस लंबे अंतराल में प्रौद्योगिकी में काफी परिवर्तन दर्ज हुआ। पाचवीं से आठवीं या नवीं शताब्दी के मध्य दक्षिणी यूरोप और भूमध्यसागर के आसपास मे क्षेत्रों में बीजःउपज का अनुपात लगभग 11.6 या अधिक से अधिक 12.5 था। अर्थ है 10 किलो बीज बोने पर अधिकतम सिर्फ 25 किलो अन्न का उत्पादन। इस समय उपलब्ध प्रौद्योगिकी अतिसाधारण थी। इस समय हल के रूप में खुरचने वाला हल का इस्तेमाल होता था जिससे जमीन की गहरी खुदाई नहीं हो पाती थी। इससे जमीन की उर्वरकता का अधिकतम दोहन नहीं हो पाता था। फलस्वरूप बड़े-बड़े खेतों में फसल लगाना पड़ता था और श्रम भी ज्यादा लगता था। श्रमिकों के अधिक माग के कारण सामाजिक स्तर पर भी तनाव बना रहता था।
1.4.7- परंतु मध्य काल में कृषि प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विकास हुआ। कृषि के क्षेत्र में भारी हल का प्रयोग,दो-खेत व्यवस्था के स्थान पर तीन-खेती व्यवस्था, बारी-बारी से फसल उगाना ;बतवच तवजंजपवदद्ध नई फसलें जैसे मटर, बीन्स आदि का उपजाने की शुरूआत हुई। भारी हल खींचने के लिए बैल तथा बाद में घोड़े का प्रयोग किया गया। इससे 12वीं शताब्दी में श्रम और भूमि की उत्पादकता में वृद्धि हुई। अब बीजःफसल का अनुपात 14 हो गया यानि अधिशेष की मात्रा तिगुनी हो गई थी। इसके अलावा पनचक्की एवं पवनचक्की के प्रयोग के कारण मानव श्रम की आवश्यकता भी कम हो गई। परिणामस्वरूप कृषि के लिए अतिरिक्त मानव संसाधन उपलब्ध थे। परंतु इस तरह की प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल हेतु अधिक पूॅंजी की जरूरत होती थी जिसके कारण किसानों के बीच पहले से मौजूद मतभेद को और अधिक विस्तरित कर दिया। अब छोटे किसान भी कृषि में अधिक पूॅजी निवेश करने लगा और बाजार में उत्पाद को बेचने लगा। परंतु कृषि के वाणिज्यिकरण के कारण और असमय फसल के नष्ट होने के चलते उसे भूमिहीन मजदूर बनने को बाध्य होना पड़ता था। इस प्रकार मजदूर, भूमि और उपज तीनों बाजार के द्वारा निर्धारित होने लगे इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप किसानों के बीच भेद और तीव्र हो गया जो सामंतवाद के पतन के लिए जिम्मेदार साबित हुआ।
1.4.7. जनसंख्या में वृद्धि
1960-70 के दशक में नव-माल्थसवादियों ने भी सामंतवाद के पतन की व्याख्या अपने तरीके से की। इनका मानना है कि जनसंख्या के पैटर्न में आए बदलाव के कारण सामंती अर्थव्यवस्था का पतन हुआ। ये आगे कहते हैं कि आर्थिक ढाॅंचे में दीर्घकालीक परिवर्तन में जनसंख्या की बड़ी भूमिका थी। इमैनुएल लि राॅय लादूरी ;म्उउंदनमस स्म त्वल स्ंकनतपमद्ध ने यह तर्क दिया कि मध्ययुगीन यूरोप में बढ़ी हुई आबादी का बोझ सहन करने में कृषि अपने को असमर्थ पा रही थी। जनसंख्या में वृद्धि के साथ-साथ उत्पादकता में गिरावट, जोतांे का विखंडन, मजदूरी मे गिरावट और लगान में वृद्धि के कारण कृषि संकट पैदा हो गया। इसलिए 1314-150 में अकाल और 1348-51 में प्लेग ने ऐसा कहर बरपाया कि यूरोप की एक चैथाई जनसख्ंया समाप्त हो गई। इससे मध्ययुगीन यूरोप का संपूर्ण संतुलन बिगड़ गया और पूॅजीवाद की और संक्रमण हुआ।
1.4.8. पुनर्जागरण और धर्मसुधार
पुनर्जागरण एवं धर्मसुधार आंदोलन भी सामंतवाद के पतन में अपना योगदान दिया। पुनर्जागरण ने मानवतावाद और राष्ट्रीय-राज्यों के उदय का मार्गा प्रशस्त किया। इसके साथ ही साथ तर्क और विवेक पर आधारित एक ऐसी विचारधारा का जन्म हुआ जो सामंती विचारधारा से मेल नहीं खाती थी। धर्मसुधार आंदोलन में उस चर्च की महत्ता पर कुठाराघात किया जो सामंती व्यावस्था का एक मुख्य आधार था। मठो की जमीन जब्त कर ली गयीः पादरियों के विशेषाधिकार छिन लिये गये और रूढ़िवादी विचारधारा पर प्रहार हुए। दूसरे शब्दों में सामंतवाद के आधार स्तंभों को हिला दिया गया।
1.4.9 पूंजीवाद का विकास
यूरोप में पंूजीवाद के विकास को तीन चरणों- प्रारंभिक पंूजीवाद(1200 ई.-1750 ई.), पूर्ण पंूजीवाद(1750 ई.-1914 ई.) और आधुनिक पंूजीवाद(1914 ई.-वर्तमान) में देखा जा सकता है। पंूजीवाद का विकास सबसे पहले उन देशों में प्रारंभ हुआ जिनका शासन अपेक्षाकृत अधिक उदार था। पंूजीवाद के उदय के कारणों पर यदि दृष्टि डाली जाये तो यह स्पष्ट होता है कि लोहे के अधिकाधिक दोहन ने उत्पादन की प्रक्रिया में तेजी ला दी। अब कृषि एवं उद्योगों का त्वरित विकास होने लगा एवं खनन की तकनीकों में भी महत्वपूर्ण सुधार हुए, बहुमूल्य धातुओं का उत्पादन भी बढ़ने लगा। अमेरिका से भी भारी मात्रा में सोना, चांदी लायी गयी। मौद्रिक अर्थव्यवस्था में तेजी से वस्तु विनिमय की प्रणाली समाप्त होने लगी।
8 सामुद्रिक-परिवहन में भी कुतुबनुमा और नयी प्रकार के पालों से क्रांतिकारी परिवर्तन हुए एवं अनेक देशों की खोज की गयी और उपनिवेश स्थापना का दौर प्रारंभ हुआ, इसने व्यापार के विस्तार को बढ़ावा दिया जिससे पंूजी में आशातीत वृद्धि हुई। इन सबके परिणामस्वरूप मध्ययुगीन श्रेणियां( शिल्पी संघ)कमजोर होते गये और व्यावसायिक वर्ग शक्तिशाली होता गया। उन्नत किस्म के उपकरणों के निर्माण एवं उनके प्रयोग ने पंूजीवाद को प्रारंभ में बहुत योगदान दिया था, इससे जहां समय की बचत हुई, निर्माण में तेजी आयी वहीं निर्मित वस्तुओं की गुणवत्ता में भी सुधार हुआ। जैसे ही व्यवसाय की मात्रा बड़ी वैसे ही बैंकिंग व्यवस्था भी शुरू हो गयी और सर्वप्रथम फ्लोरेंस के मेडिसी परिवार ने पहली बैंकिंग प्रणाली की आधारशिला रखी, और शीघ्र ही यूरोप के प्रायः सभी प्रमुख नगरों में इस बैंक की शाखाऐं स्थापित हो गयीं। बैंकिंग व्यवस्था की साख प्रणाली से व्यापार को अत्यधिक प्रोत्साहन मिला। शीघ्र ही व्यापार एवं वाणिज्य को वैश्विक स्तर में चलाने के लिए संयुक्त पंूजी कम्पनियों की स्थापना होने लगी। इंग्लैंण्ड ने सर्वप्रथम 1550 ई. के दसक में रूस और गुयाना में व्यापारिक गतिविधियों के लिए एक संयुक्त कंपनी बनायी थी, शीघ्र ही और संयुक्त कंपनियां बनने लगीं और 1600 ई. में इंग्लैंण्ड में लगभग 12 संयुक्त पंूजी कंपनियां कार्यरत थीं, जिनमें से एक ईस्ट इण्डिया कम्पनी भी थी। आधुनिक पंूजीवादी चरण में हम बीमा कंपनियों का विकास भी देखेते हैं जो व्यापार में जोखिम को कम करने के उद्देश्य से निर्मित हुईं थीं।
1.4.10 पंूजीवाद एवं सामन्ती व्यवस्था में अंतर
प्ूंजीवादी व्यवस्था में एक पंूजीपति अपने धन को जमा करके नहीं रखता है वरन् इसके विपरीत वह लाभ कमाने के उद्देश्य से उसका निवेश करता है। वस्तुओं का उत्पादन भी बाजार में बेचकर मुनाफा कमाने के लिए किया जाता है, इस व्यवस्था में बाजार प्रणाली सक्रिय रहती है। इसके विपरीत सामंती व्यवस्था में लाभ कमाने के लिए धन का निवेश नहीं किया जाता है और वस्तुओं का उत्पादन भी स्थानीय उपभोग के लिए ही होता है एवं बाजार प्रायः जड़वत् बना रहता है।
1.4.11 पूंजीवाद के प्रमुख लक्षण
पूंजीवादी व्यवस्था में निजी सम्पत्ति का अत्यधिक महत्व है और सामान्यतः इस व्यवस्था में सरकार ऐसे प्रावधान करती है जिससे निजी सम्पत्ति सुरक्षित रह सके, व्यक्ति अपनी सम्पत्ति की वसीयत कर उसे अपनी मृत्यु के बाद अपने उत्तराधिकारियों को देने का अधिकार रखता है। इस व्यवस्था में व्यक्ति को व्यवसाय चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है और पूरी अर्थव्यवस्था लाभ कमाने के उद्देश्य से ही काम करती है।प्रतिस्पर्धा इस व्यवस्था का एक अन्य आवश्यक अंग है।सभी खरीददार एवं सभी विक्रेता मिलकर ही साधनों एवं वस्तुओं के दाम निर्धारित करते है, अकेले खरीददार या अकेले विक्रेता के कार्यों से कीमतें प्रभावित नहीं की जा सकती हैं। यदि प्रतिस्पर्धा स्वस्थ है तो उत्पादन में कार्यकुशलता की वृद्धि होती है।
1.5 सारांश
कुल मिलाकर इतिहासकार जनसंख्या में परिवर्तन और व्यापार की भूमिका को सामंती अर्थव्यवस्था के रूपान्तरण के लिए जिम्मेदार मानते है। आर्थिक इतिहासकार एम.एम. पोस्टन एवं ई.ले. राय लादूरी जनसंख्या के विस्तार एंव संकुचन के संदर्भ में सामंती व्यवस्था के पतन हेतु व्याख्यायित करते है। दूसरी तरफ हेनरी पिरेन और ई0 वैलरस्टीन जैसे इतिहासकार व्यापार की भूमिका पर बल देते है। एक अन्य इतिहासकार राबर्ट ब्रेनर ने 1976 में अपने लेख एग्रेरियन क्लास स्ट्रक्चर एंड इकानोमिक डेवलपमेंट इन प्री-इंडस्ट्रियल यूरोपमें यह दलील दी है कि जनसंख्या माॅडलएवं व्यापार माॅडलएवं व्यापार माॅडल सामंती व्यवस्था के भीतर के परिवर्तन को स्पष्ट करने में असमर्थ है। इन्होने इन परिवर्तनों के पीछे मध्यकाल में हो रहे वर्ग-संघर्ष को वास्तविक कारण मानते है। इस वर्ग संघर्ष के दो मुख्य समूह थे किसान और सामंती समुदाय। ब्रेनर की भाॅति पेरी एंडरसन  भी सामंतवाद से पूॅजीवाद की संक्रांति में राजनीतिक कारकों की भूमिका मानते है। वह शहरों और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के महत्व को आंशिक रूप से मानते है।इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि सामंतवाद का पतन उन सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक व धार्मिक तथा बौद्धिक वातावरण में हुआ, जिनका उदय एंव विकास बड़ी तेजी से 13वीं शताब्दी में होने लगा। धर्मयुद्ध, वाणिज्यिक क्रांति, पूॅजीवाद की ओर संक्रमण, राष्ट्रीय-राज्यों का उदय, जनसंख्या में परिवर्तन, कृषि अर्थव्यवस्थां में बदलाव, अकाल, महामारी आदि ऐतिहासिक घटनाक्रमों ने एक साथ मिलकर सामंतवाद के पतन में अपना योगदान दिया। सामंतवाद का पतन उन देशों में पहले हुआ जहाॅ उपयुक्त आधुनिक शक्तियों का झौंका पहले आया। पश्चिमी यूरोपीय देशों सामंतवाद का पतन पहले हुआ और मध्य एवं पूर्वी यूरोपीय देशों में बाद में।
सत्य/असत्य बताए
सामंतवाद की मुख्य विशेषताएॅ थी- राजनीतिक सत्ता का विखंडीकरण एवं निजी लोगों के हाथों में सैन्य शक्ति का संकेन्द्रण।
सामंतवाद के पतन हेतु सामंतों के बीच अनवरत युद्ध ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इंग्लैंड में गुलाबों की लड़ाई के दौरान राजा एडवर्ड पंचम था।
रिक्त स्थानों की पूर्ति करेः
1358 में ग्रैंड जैकारी नामक विद्रोह ................................. में हुआ था।
मेडिवल सिटीजः देअर ओरिजन एण्ड रिवाइवल आॅफ टेªड के लेखक ................................. है।
किसानों के बीच विभेदीकरण किस प्रकार सामंतवाद के पतन को आगे बढ़ाया ?
सामंतवाद के पतन के लिए आंतरिक संघट किस प्रकार अपनी भूमिका निभाई ?
1.6 शब्दावली
सामंतवाद - 9वीं शताब्दी से 14वीं शताब्दी के मध्य पश्चिमी और मध्य यूरोप में एक राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक प्रणाली थी जिसमें अधिपतियों की संप्रभुता के साथ-साथ राजनीतिक विखंडीकरण प्रमुख विशेषता थी। बूलैंवीयै ;ठवनसंपदअपससमतेद्ध: अठारहवीं शताब्दी का एक फ्रांसीसी दार्शनिक मौन्टेसक्यू: फ्रांसिसी दार्शनिक (1689-1755)द स्पिरिट आॅफ लाॅसइनकी प्रसिद्ध कृति है। मैनोर: सामंती व्यवस्था में आर्थिक उत्पादन एवं सामाजिक जीवन का एक आधारभूत इकाई। इसमें कई छोटे-छोटे आश्रित खेत होते थे जिस पर अधिपति का सीधा अधिकार होता था और कृषि दासों और इससे बंधे किसानो से खेती कराई जाती थी। गुलाबों की लड़ाई (1455-85): 15वीं शताब्दी में इंग्लैंड में सामंतो के लड़ाई में एडवर्ड चतुर्थ के द्वारा बंदूक का प्रयोग किया गया था जिसमें सामंतो कां बहुत क्षति पहुॅची। जैकरी विद्रोह: 14 वीं सदी के पूर्वार्ध में पश्चिमी यूरोप में सामंती आहरण के बढ़ते बोझ के खिलाफ किसानों के द्वारा प्रतिरोध खड़ा किया गया था। इसी विद्रोह के क्रम में 1358 में फ्रांस में जो किसान विद्रोह हुआ था, ग्रैंड जैकरी के नाम से जाना जाता है। कैरोलिंजी ;ब्ंतवसपदहपंदद्ध: सातवीं शताब्दी में यह फ्रैकिश शासकीय वंश सत्ता में आया। शार्लमान्य के नेतृत्व में उसने पश्चिम में रोपन साम्राज्य के पहले के अधिकांश क्षेत्रों को अपने अधीन कर लिया। नवीं शताब्दी के अंत में इस साम्राज्य का पतन हो गया। शार्लमान्य: फ्रैंक्स का महान राजा चाल्र्स (771-814) जिसने पश्चिम में रोमन क्षेत्रों को समेटकर एक विशाल साम्राज्य स्थापित किया।
10 धर्मयुद्धः 11वीं और 13वीं शताब्दी के बीच ईसाइयों की प्रतिरक्षा में मुसलमानों के विरूद्ध लड़ा जाने वाला युद्ध। काली मौत ;ठसंबा कमंजीद्ध: यूरोप में 14वीं शताब्दी के मध्य में प्लेग महामारी के रूप में फैली थी और अनुमानतः इसमें यूरोप की आबादी का एक तिहाई से एक चैथाई के बीच लोगों की मृत्यु हो गई थी। मैनर: सामंती व्यावस्था में आर्थिक उत्पादन के साथ-साथ सामाजिक जीवन का भी एक आधारभूत इकाई थी जिस पर कई छोटे-छोटे आश्रित खेत शामिल होते थे। इस पर अधिपति का कृषि दासों पर सीधा अधिकार होता था

1 टिप्पणी:

Ankit mishra. ने कहा…

Sir. Apke blog se bhut help mili h mujhe 😘