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कक्षा 9 पाठ- द्वितीय
स्वर्णकाकः
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हिन्दीअर्थ
1. पुरा
कस्मिंश्चिद् ...................................................................................
तामसोपानेनैव आगमिष्यामि |
अर्थ- पहले किसी
गाँव में एक निर्धन वृद्ध स्त्री रहती थी। उसकी एक पुत्री विनम और सुन्दर थी । एक
बार माँ ने थाली में चावलों को रखकर प को आदेश दिया कि - सूरज की गर्मी में
पक्षियों से चावलों की रक्षा करना | कुछ समय के बाद उसने इस तरह का सोने के पंख और चांदी की
चोंच वाला सोने का कौआ पहले कभी नहीं देखा था ।उसको चावलों को खाते हुए और हंसते
हुए देखकर बालिका रोने लगी। उसे हटाते हुए वह प्रार्थना करने लगी कि - चावलों को
मत खाओ । मेरी माँ सोने के पंखों वाला कौआ बोला , चिंता मत करो | तुम (कल) सूरज निकलने से पहले गाँव के बाहर पीपल के पेड़ के
पास आ जाना ।मैं तुम्हें चावलों का मुल्य दूँगा । प्रसन्न हई बालिका सो भी न पाई ।
सूर्योदय के पहले ही वह वहाँ पर पहुँच गई ।पेड़ के उपर देखकर वह आश्चर्यचकित हुई
क्योंकि वहाँ सोने का महल था । जब कौआ सो कर
उठा तब उसने सोने की खिड़की से बोला - 'अरे बालिका ! तुम आ गई ? रुको , मैं तुम्हारे
लिए सीढ़ी उतारता हूँ , बोलो सोने
की,
चांदी की या तांबे की (सीढ़ी उतारँ) सोने की सीढी से वह
सोने के भवन में लडकी बोली , 'मैं
गरीब माँ की बेटी हूँ | ताँबे की
सीढ़ी से ही आऊँगी' |
2. परं
स्वर्णसोपानेन सा .................................................................................................
पुत्री आसीत् ।
अर्थ- पर आई देर तक भवने में चित्र-विचित्र वस्तुओं को सजा हुआ देखकर वह
बहुत |
आश्चर्यचकित हुई। उसको थका हुआ देखकर कौआ बोला - 'पहले थोड़ा नाश्ता करो, बोलो । तुम सोने की थाली में खाना खाओगी, या चाँदी की या तांबे की ?' बालिका ने उत्तर दिया - 'मैं गरीब तांबे की थाली में ही खाना खाऊँगी ।तब वह लड़की तब
आश्चर्यचकित हुई जब स्वर्णकाक ने सोने की थाली में खाना परोसा बालिका ने
इतना स्वादिष्ठ भोजन आज तक नहीं खाया था | कौआ बोला - | बालिका ! मैं तो चाहता हूँ कि तुम हमेशा यही रुको पर
तुम्हारी माँ अकेली तम जल्दी ही अपने घर जाओ ।' यह कहकर कौआ कक्षा के अंदर से तीन पेटियाँ लाकर उसको बोला
- 'बालिका, तुम कोई एक | पेटी ले लो। सबसे छोटी पेटी लेकर बालिका बोली -'इतना ही है मेरे चावलों का मूल्य।' घर आकर उसने
पेटी खोली , उसमें बहुमूल्य हीरे थे |प्रसन्न हुई वह और उस दिन से उसी गाँव में एक अन्य लोभी
वृद्धा रहती थी । उसकी भी एक
लड़की थी ।
3. ईर्ष्या
सा ..............................................................................................................लोभं
पर्यत्यजत् ।
ईर्ष्या
से उसने उस स्वर्णकाक के रहस्य को जान लिया कन्या लडकी बोली , "मैं गरीब माँ की बेटी हूँ | ताँबे की सीढ़ी से ही आऊँगी' | पर सोने की सीढ़ी से वह सोने के भवन में आई। देर तक भवने में चित्र-विचित्र वस्तुओं को सजा हुआ देखकर वह
बहुत |
आश्चर्यचकित हुई। उसको थका हुआ देखकर कौआ बोला - 'पहले थोड़ा नाश्ता करो, बोलो, | तुम
सोने की थाली में खाना खाओगी, या चाँदी की
या तांबे की ?' बालिका ने उत्तर दिया - 'मैं गरीब तांबे की थाली में ही खाना खाऊँगी । तब वह लडकी तब
आश्चर्यचकित हुई जब स्वर्णकाक ने सोने की थाली में खाना परोसा । बालिका ने इतना
स्वादिष्ठ भोजन आज तक नहीं खाया था | कौआ बोला - | बालिका ! मैं तो चाहता हूँ कि तुम हमेशा यही रुको पर
तुम्हारी माँ अकेली तम जल्दी ही अपने घर जाओ । यह कहकर कौआ कक्षा के अंदर से तीन
पेटियाँ लाकर उसको बोला - 'बालिका, तुम कोई एक | पेटी ले लो। सबसे छोटी पेटी लेकर बालिका बोली -'इतना ही है मेरे चावलों का मूल्य।' घर आकर उसने पेटी खोली , उसमें बहुमूल्य हीरे थे ।प्रसन्न हुई वह और उस दिन से अम मे
एका परा लुब्धा वृद्धा न्यवसत् । उसी गाँव में एक अन्य लोभी वृद्धा रहती थी| उसकी भी एक लड़की थी । ईर्ष्या से उसने उस स्वर्णकाक के
रहस्य को जान लिया । उसने सूरज की
गरमी में चावलों को रखकर अपनी बेटी | रक्षा के लिए नियुक्त की। तभी सोने के पंखों वाला कौआ
चावलों को खाते हुए उसे भी सुबह वहाँ जाकर वह कौए की निंदा करते हुए बोली, 'अरे नीच कौए! मैं आई हूँ, मुझे चावलों का मूल्य दो ।'कौआ बोला मैं तम्हारे लिए सीढी उतारता हूँ । तो बोलो
सोनेवाली,चाँदीवाली या तांबेवाली सीढ़ी उतारूं ? घमंड से बालिका बोली मैं सोने की सीढ़ी से ही आऊँगी लेकिन
स्वर्णकाक ने उस | के लिए तांबे
की ही सीढ़ी उतारी। लौटते समय स्वर्णकाक ने कक्षा के अंदर से तीन पेटियाँ उसके
सामने रख दी लोभ के वशीभूत उस (बालिका) ने
बड़ी पेटी ले ली । घर आकर उसने खुशी के मारे पेटी खोली... तो उसमें भयानक काला
सांप देखा | लोभी बालिका ने लोभ का
फल पा लिया । उस के बाद उसने लोभ करना छोड़ दिया |

2 टिप्पणियां:
It's really true
Nice sir 😘
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