सौंदर्य का सच्चा स्वरूप पर निबंध
एक
छोटे से शब्द प्रकृति-मे कितना कुछ समझता है कोई सोच भी नहीं सकता। प्रकृति के
अन्दर वायु, पानी, मिट्टी, पेड़-पौधे, पशूपक्षी, नदियाँ, सरोवर, झरने, समुद्र, जंगल, पहाड़,खनिज आदि और न जाने कितने प्राकृतिक संसाधन आते हैं। इन सभी से
हमें सांस लेने के लिए शुद्ध हवा, पीने के लिए पानी, भोजन आदि जो जीवन के लिए नितांत आवश्यक हे उपलब्ध
होते हैं। प्रकृति से हमें जीवन जीने की उमंग मिलती है। बसंत देखकर दिल खुश होता
है, सावन
में रिमझिम बरसात मन को मोह लेती है, इंद्रधनुष हमारे अंत रंग में रंगीन सपने सजाता है।
प्रकृति हमे शारीरिक सुख-सुविधा के साथ-साथ मानसिक सुख भी देती है पर हमारे पास
प्रकृति को देने के लिए कोई वस्तु नहीं है। यदि कुछ हे तो वह सिर्फ इतना कि हम
इसका संरक्षण कर सके।
सूर्य
की पहली किरण से लेकर चाँद की चाँदनी तक,खुले मैदानों, बुग्यालों से लेकर जंगल और पहाड़ों तक, नदी के कल-कल मधुर संगीत से
लेकर समुद्र में उठती लहरों, पेड़ पर बैठी चिड़िया की चहचहाहट जो भी हमारे आसपास उपलब्ध
प्राकृतिक संसाधन है हमेसवका अनुभव करना चाहिये और आनन्द उठाना चाहिये। क्योंकि जब
तक हमे इसके महत्व का बोध नहीं होगा और जब तक हम इसके सौंदर्य की सराहना करना नहीं
सीखेंगे तब तक हमारे लिए यह महत्व का विषय नहीं हो सकती। किसी चित्रकार, कवि, लेखक और कलाकारों के भाव
तभी जागृत होते हैं जब वह प्रकृति की गोद में शांत वातावरण में कल्पना करता है, तभी वह उसे कागज पर उतारता
है। इसके बिना तो जीवन में रंग भी नहीं है। जब इंसान मशीनी जीवन जीते-जीते ऊब जाता
है तो प्रकृति की गोद में जाकर सुकून की साँस लेना चाहता है। आजकल के युग में
मनुष्य प्राकृतिक वस्तुओं की ओर ज्यादा आकर्षित हो रहा है और वस्तुएं खरीदते समय
भी वह प्राकृतिक वस्तुओया प्राकृतिक तन्नों से बनी वस्तुओको ही महत्व देता है। जब
हम प्राकृतिक उत्पादों को इतना महत्व देते हैं तो प्रकृतिको क्यों नहीं? आखिर ये सब वस्तुएँ तभी तक
उपलब्ध जब तक यह प्रकृति है।
हम
प्रकृति से चाहते तो बहुत कुछ हैं लेकिन अपनी कीमत पर रा जिस रफ्तार से हम पेड़
काट करवनोंको कम करके उत्पादों का निर्माण कर रहे हैं उतनी रफ्तार से पौधों का
रोपण नहीं हो रहा है। हमें पीने के लिए अच्छ ओत चाहिये लेकिन कल-कारख़ानों का सारा जहरीला
पानी हम नदियों में ही बहाते हैं।खाने के लिए हमे रसायन मुक्त फल-फूतओर भोजन
चाहिये लेकिन रसायनों का प्रयोगबन्द नहीं करते। यदि ऐसा हीरहातो दिखावेमात्र
प्रयास करने से प्रकृति पर कुछ प्रभाव नहीं पड़ेगा। जैसा व्यवहार हम प्रकृति के
साथ करेंगे वैसा ही वह हमारे साध करेगी। बेमोसमी बरसात, बाढ़, सूखा, मौसम परिवर्तन, भू-स्खलन, सूखते जंगल, बंजर भूमि इन सब परिणामों
के लिए हमें तैयार रहना चाहये। यदि ऐसा ही रहा तो दिन प्रति दिन यह प्रकृति
धीरे-धीरे तुप्त होतीजायेगी इसतिए हमें प्रत्यन करना चाहिये कि हम प्रकृतिका
संतुलन बिगाड़े बगेर इसका लाभ उठा सके। अन्यथा इसे स्वच्छ और स्वस्थ रखे बिना
स्वच्छ और स्वस्थ जीवन की आशा करनादेकार है।

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