जनात्मक लेखन (क्रिएटिव राइटिंग) का उद्देश्य सूचित करना मात्र ही नहीं, अपितु रहस्यों व रसों को उद्घाटित करना
होता है। इसे कुछ लोग एक आध्यात्मिक प्रक्रिया मानते हैं। रचनात्मक लेखक कभी तटस्थ
रूप से दुनिया की ठोस चीजों के बारे में बात करता है तो कभी भावविह्वल होकर वह
प्रेम, पवित्रता, पलायन, ईश्वर, नश्वरता आदि
विषयों के बारे में अपने उद्गार व्यक्त करता है। अन्यथा लेखन में वह अपनी अपूर्व
कल्पना का इस्तेमाल करता है। वह जीवन के विभिन्न पहलुओें में संबंध बनाता है और
सामाजिक स्थितियों और घटनाओं के विषय में लिखता है। इस प्रकार वह अपने लेखन में
अपने हृदय के निकट के विषयों को प्रकाशित करता है, उन्हें ऊँचा उठाता है और लेखन के माध्यम से समाज में
परिवर्तन लाने का प्रयास करता है।
सृजनात्मकता सभी कलाओं की प्राथमिक प्रेरणा है। इसे परिभाषित करना वैसे ही
काल्पनिक एवं कठिन है जैसे कि प्यार और घृणा जैसे विषयों को परिभाषित करना।
सृजनात्मकता एक आदर्श वैचारिकता है जो एक कलाकार के मस्तिष्क की कल्पनापूर्ण
स्वाभाविक प्रवृति है तथा कलाकार से संबंधित उसके अतीत और वर्तमान के परिवेश से
प्रभावित है।
प्रभावशाली सृजनात्मक लेखन निम्नलिखित कार्य करता हैः
(१) पाठकों का
ध्यान आकर्षित करता है,
(२) पाठकों में
रूचि व इच्छा जागृत करता है।
सृजनात्मक लेखन अर्थात् नूतन निर्माण की संकल्पना, प्रतिभा एवं शक्ति से निर्मित पदार्थ
(लेख)। सृजनात्मकता को ही कॉलरिज कल्पना कहता है। कल्पना अर्थात्- नव-सृजन की वह
जीवनी शक्ति जो कलाकारों, कवियों, वैज्ञानिकों और दार्शनिकों में होती है।
हमारे देश में इस समय इंग्लिश में तो चेतन भगत, तुषार रहेजा जैसे अनेक युवा, लेखन कर रहे हैं,
लेकिन
हिंदी साहित्य में युवा लेखक अपेक्षाकृत कम आ रहे हैं। जाहिर है ऐसा होने के पीछे
कुछ कारण भी हैं। मुझे लगता है इसकी सबसे अहम वजह शिक्षा का माध्यम है। वर्तमान
में हमारी शिक्षा पद्धति हिंदी की बजाय,
अंग्रेजी
में ज्यादा हो रही है। इसके चलते हिंदी में लेखन कम होने लगा है। लोग जिस माध्यम
से शिक्षा पाते हैं, उनकी विचार
प्रक्रिया भी उसी के अनुसार काम करने लगती है। बोलचाल की बात हो या लेखन की..
सामान्यत: लोग अपनी मातृभाषा में ही ज्यादा अनुकूलता के साथ व्यवहार कर पाते हैं।
ऐसा नहीं है कि हिंदी भाषी क्षेत्रों में योग्यता की कमी हो। सच तो यह है कि
तुलनात्मक रूप से पठन-पाठन में रुचि ही कम हो गई है। वर्तमान युवा वर्ग का ध्यान
करियर की तरफ ज्यादा है। पहले बच्चों को पाठ्य पुस्तकों के अलावा दूसरी पुस्तकों
को पढ़ने के लिए भी प्रेरित किया जाता था,
लेकिन
अब ऐसा नहीं है। अब तो सब-कुछ करियर के नजरिए से ही तय हो रहा है। चूंकि साहित्य
में अन्य क्षेत्रों की तुलना में स्थापित होने में ज्यादा समय लगता है, इसलिए भी युवा वर्ग इस ओर ध्यान देने की
बजाय, अन्य क्षेत्रों की
चकाचौंध की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। यह भी माना जा रहा है कि वर्तमान में साहित्य
क्षेत्र में बाजारवाद हावी है और लेखक बंधी-बंधाई लीक (फामरूला-आधारित) पर काम कर
रहे हैं। मैं इस बात से सहमत नहीं हूं। हकीकत यह है कि हिंदी में वर्तमान दौर में
अनेक लेखकों द्वारा सृजनात्मक साहित्य रचा जा रहा है। किसी भी भाषा में अब तक शायद
इस तरह की किताबें नहीं आई हैं। वैसे इन दिनों ज्यादातर साहित्य स्त्री-पुरुष
संबंधों और शहरी जीवन पर आधारित है,
गांव
कहीं पीछे छूट रहा है। दरअसल, पहले प्रेमचंद
जैसे अनेक लेखक गांवों से ताल्लुक रखते थे,
लिहाजा
उनके लेखन में भी ग्रामीण जीवन झलकता था
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