मन्नू भंडारी के उपन्यासों का आलोचनात्मक अध्ययन : आपका बंटी:
आधुनिक हिन्दी लेखिकाओं में मन्नू भंडारी का स्थान महत्वपूर्ण है। 'आपका बंटी' स्वतंत्र रूप से लिखा गया उनका पहला उपन्यास है। स्वतंत्र
इसलिए कहा गया है कि इसके पूर्व '
एक
इंच मुस्कान' उपन्यास
राजेन्द्र यादव के सहयोग से लिखा गया था। उक्त उपन्यास पहला ले किन महत्वपूर्ण व
बहुचर्चित है।
"हिन्दी का यह
पहला उपन्यास है जिसमें एक परिस्थति में पडे हुए बच्चे की मन:स्थिति का इतनी
विस्तृत फलक पर चित्राकंन किया है।" हिन्दी उपन्यास एक अन्तर्यात्रा के
अन्तर्गत डॉ रामदरश मिश्र जी इस उपन्यास के बारे में लिखते हैं- "मैंने एक
विशेष दायरे की बात कही है वह दायरा है पढ़ा-लिखा मध्यवर्ग, यानि ये लेखिकाएँ स्वयं जिस वर्ग की हैं ।
निम्नवर्ग की स्त्रियों का अनुभव इनके पास नहीं है। उषा प्रियंवदा के दोनों
उपन्यास 'रूकोगी नहीं राधिका' 'पचपन खंभे लाल दिवारे' अति आधुनिक, पढी-लिखी स्त्री की कथा कहते हैं , किन्तु दोनों उपन्यासों में स्त्री
स्वतंत्र निर्णय लेने की शक्ति रखने के बावजूद अजीब बेबसी और सामाजिक घिराव में
अपने को बन्द पाती हैं । मन्नू भंडारी ने 'आपका बंटी' में तलाकशुदा, पति-पत्नी के प्रश्न को बच्चे की समस्या के
बिन्दु से उठाया है। यह एक नया प्रश्न है।"
सात साल का बंटी शिक्षित व स्वतंत्र विचारधारा वाले माता शकुनअजय का पुत्र है।
शकुन एवं अजय दोनों अहम की भावना से ग्रस्त होने केकारण उनमें कभी समझौता नहीं हो
पाता, और दोनों एक दूसरे से
अलग हो जाते हैं । शकुन दिल्ली की किसी कॉलेज में प्रिसिपल हो जाती है। दूसरी ओर
अजय कलकत्ता चला जाता है। अजय के कलकत्ता चले जाने के बाद वह अपने बेटे बंटी को
साल में तीन-चार बार मिलने आता था। जब भी अजय दिल्ली आता था तो वह होटल में रुकता
और वहाँ बंटी को बुलाकर अच्छे-अच्छे खिलौने दिलवाता। बंटी चाहता है कि उसके पापा
और मम्मी एक साथ रहें, लेकिन वह उनकी
लडाई समझ नहीं पाता। कुछ समय बाद पति-पत्नी के बीच तलाक हो जाता है । वकील चाचा
सोचते थे कि बच्चा पति-पत्नी की दूरी को पाटने में सहायक हो सकता है। परंतु ऐसा न
हुआ।
कुछ समय बाद अजय, मीरा के साथ
विवाह कर लेता है, और शकुन भी
अपना भविष्य देखते हुए डॉ. जोशी से विवाह कर लेती है। डॉ. जोशी विधुर था लेकिन
उनके दो बच्चे अमी और जोत थे । शकुन विवाह के बाद अपना घर छोडकर डॉ.जोशी के घर
बंटी के साथ रहने जाती है। बंटी को नया घर और नये लोग अच्छे नहीं लगते । जब उसकी
मम्मी डॉ. जोशी के बच्चे को प्रेम करती है तो बंटी यह बरदाश्त नहीं का पाता और न
वह डॉ.जोशी को पापा के रूप में स्वीकार कर पाता है। इस नये घर में वह स्वयं को
उपेक्षित महसूस करता है। अब वह मम्मी को दु:ख पहुँचाने में सुख का आनंद लेता है ।
बंटी के ऐसे स्वभाव के कारण शकुन उसे कई बार पिटती भी है। अंत में बंटी अपने पापा
को पत्र लिखकर अपने साथ कलकत्ता ले जाने को कहता है । बंटी कलकत्ता जाकर दूसरी
दुविधा में पडता है। क्यों कि वहाँ वह अपनी दूसरी माँ मीरा को भी स्वीकार नहीं कर
पाता। अंत में बंटी की हालत ऐसी हो जाती है कि धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का' रह जाता है। अंत में बेचारे बंटी को
माता-पिता होते हुए अनाथ की भाँति होस्टल में जीवन बिताने के लिए मजबूर होना पड़ता
है।
इस प्रकार हम देख सकते है कि स्त्री- शिक्षा के बढ़ते प्रचार-प्रसार से आधुनिक
स्त्री जहाँ आत्मनिर्भर हुई है वहाँ दूसरी तरफ उसने कतिपय सामाजिक समस्याओं को
जन्म दिया है। पुरानी अनपढ, अशिक्षित या
रूढिवादी संस्कारों से ग्रसित नारी
पूर्णतया परावलंबित होने से कई बार अपमानजनक समझौतों को करते हुए भी दामपत्य की
गाडी खींच ले जाती थी। वहाँ आज की आधुनिक स्त्री आर्थिक दृष्टि से स्वनिर्भर होने
पर इस प्रकार के समझौते के लिए तैयार नहीं होती।
प्रस्तुत उपन्यास में खंडित दामपत्य को दिखाना-मात्र लेखिका का लक्ष्य नहीं
है। स्वयं मन्नू जी अपने इस उपन्यास के बारे में लिखती है - "मैं दिखाना
चाहती थी कि खंडित माता-पिता के बच्चे किन परिस्थितियों से गुजरते हैं। सबका
अपना-अपना व्यक्तित्व होता है। इस सारी परिस्थिति में बच्चों पर क्या-क्या
प्रतिक्रिया होती हैं ; यही दिखाना
चाहती थी। मैंने ऐसे बच्चों को देखा है,
तब
मन को बेचैन महसूस किया है। मैं उसी को पाठक तक पहुँचाना चाहती थी।"
'आपका बंटी' उपन्यास पर मुग्ध होकर हिन्दी साहित्य के
पहले मनोवैज्ञानिक कथाकार जैनेन्द्र कुमार लिखते हैं "बहुत अरसे बाद हिन्दी
में यह सशक्त उपन्यास आया है। लेखिका की अद्भुत क्षमता से मैं स्तब्ध रह गया हूँ।
लेखिका का संयम एवं हानुभूतिशील संवेदन इस रचना में प्रकट हुआ है। ऐसी
मर्मस्पर्शिता लेखकों में बहुत कम मिलती है।"- "आपका बंटी'
की
संरचना, स्थितियों का चुनाव, पात्रों का व्यवहार, उन सबके आपसी रिश्ते, भाषा अर्थात् संपूर्ण इकाई के रूप में उसका
गठन एक स्वतंत्र रूप से विचारणीय है।" इस उपन्यास में कथानक की माँग के
अनुरूप ही पात्रों का संयोजन किया है। वकील चाचा और शकुन के चरित्र एक-दूसरे को
पूरी तरह प्रभावित करने में समर्थ हैं। तलाकशुदा माता -पिता के संतान बंटी (अरूप
बत्रा) की दयनीय दशा का चित्रण भी कलात्मक ढंग से किया गया है । 'आपका बंटी' के बारे में माधुरी बाजपेयी लिखती हैं - "लेखिका
पात्रों के साथ (विशेष रूप से शकुन और बंटी के साथ) इतनी एकाकार हो गयी लगती हैं
कि उनके हर भाव को वह स्वयं
झेलती जीती दिख पडती है।" फूफी शकुन की सेविका और संरक्षिका के रूप में
चित्रित नजर आती है। बंटी के मन में जो स्नेह है वह मातृत्व से किसी भी रूप से कम
नहीं हैं । इस उपन्यास के संवाद संक्षिप्त और सरल है। जैसे उदा.- वकील चाचा शकुन
से एक जगह पर कहते हैं
"जब धूरी
गड़बड़ा जाती है तो जिंदगी लड खड़ा जाती है।" इस उपन्यास के संवाद छोटे हैं
लेकिन चोटदार हैं । डॉ.भगीरथ मिश्र के मतानुसार "मनुष्य का संबध
अपने युग, समाज, देश और परिस्थितियों से रहता है तथा मानव
के चरित्र की पृष्ठभूमि के रूप में देशकाल या वातावरण का चित्रण उसका आवश्यक अंग
है।" उक्त उपन्यास के पात्र,
उनके
समय, उनकी विचारधारा, रहन सहन एवं अन्याय, जिन लक्षणों को सम्बल बनाकर कथावस्तु बढ़ती
है । उनके उक्ततत्व का समग्रतः प्रतिफलन हुआ है। 'आपका बंटी' की भाषा पात्रों के अनुरूप है। इस उपन्यास
में सुशिक्षित और अशिक्षित पात्र हैं । शिक्षित पात्रों के अन्तर्गत शकुन डॉ.जोशी, अजय,
वकील
चाचा, बंटी, अमी,
जोती
आदि और श्रमिक पात्रों या अशिक्षित पात्रों के अन्तर्गत फूफी, माली,
चपरासी
बंसीलाल आदि हैं। फूफी ग्रामीण परिवेश में जुड़ी हुई है। इस कारण वह ग्रामीण भाषा
का प्रयोग करती है । वह एक जगह पर बंटी से कहती है
"अभी से
तुम्हारा ये हाल है तो बड़े होकर पता नही क्या सुख दोगे अपनीमहतारी को।" मन्नूजी
ने इस उपन्यास की भाषा में अंग्रेजी,
संस्कृत
के तत्सम, तद्भव, उर्दू, अरबी-फारसी के शब्दों का सुंदर कलात्मक ढंग से प्रयोग किया।
इस उपन्यास के हरेक पात्र के संवाद हमारे हृदय को झकझोरते है । जब फूफी हरिद्वार
जा रही थी तब वह शकुन से आर्थिक मदद लेने के बजाय वचन लेती हुई कहती है -
"देना ही है तो एक वचन दे दो कि हमारे बंटी भैया को जैसा आपने को वह स्वयं
झेलती जीती दिख पडती है।" फूफी शकुन की सेविका और संरक्षिका के रूप में
चित्रित नजर आती है। बंटी के मन में जो स्नेह है वह मातृत्व से किसी भी रूप से कम
नहीं हैं । इस उपन्यास के संवाद संक्षिप्त और सरल है। जैसे उदा.- वकील चाचा शकुन
से एक जगह पर कहते हैं "जब धूरी गड़बड़ा जाती
है तो जिंदगी लड खड़ा जाती है।" इस उपन्यास के संवाद छोटे हैं लेकिन चोटदार
हैं । डॉ.भगीरथ मिश्र के मतानुसार "मनुष्य का संबध
अपने युग, समाज, देश और परिस्थितियों से रहता है तथा मानव
के चरित्र की पृष्ठभूमि के रूप में देशकाल या वातावरण का चित्रण उसका आवश्यक अंग
है।"
उक्त उपन्यास के पात्र, उनके समय, उनकी विचारधारा, रहन सहन एवं अन्याय, जिन लक्षणों को सम्बल बनाकर कथावस्तु बढ़ती
है । उनके उक्ततत्व का समग्रतः प्रतिफलन हुआ है। 'आपका बंटी'
की
भाषा पात्रों के अनुरूप है। इस उपन्यास में सुशिक्षित और अशिक्षित पात्र हैं ।
शिक्षित पात्रों के अन्तर्गत शकुन डॉ.जोशी,
अजय, वकील चाचा, बंटी, अमी, जोती आदि और श्रमिक पात्रों या अशिक्षित पात्रों
के अन्तर्गत फूफी, माली, चपरासी बंसीलाल आदि हैं। फूफी ग्रामीण
परिवेश में जुड़ी हुई है। इस कारण वह ग्रामीण भाषा का प्रयोग करती है । वह एक जगह
पर बंटी से कहती है "अभी से
तुम्हारा ये हाल है तो बड़े होकर पता नही क्या सुख दोगे अपनीमहतारी को।" मन्नूजी
ने इस उपन्यास की भाषा में अंग्रेजी,
संस्कृत
के तत्सम, तद्भव, उर्दू, अरबी-फारसी के शब्दों का सुंदर कलात्मक ढंग से प्रयोग किया।
इस उपन्यास के हरेक पात्र के संवाद हमारे हृदय को झकझोरते है । जब फूफी हरिद्वार
जा रही थी तब वह शकुन से आर्थिक मदद लेने के बजाय वचन लेती हुई कहती है -
"देना ही है तो एक वचन दे दो कि हमारे बंटी भैया को जैसा आपने बिखरा दिया है आजकल, वैसा और मत करना । बाप के रहते यह बिना बाप
का हो रहा, अब माँ के रहते
यह बिना माँ का न हो जाये ।" हम नि:संदेह कह सकते है कि आपका बंटी' में पात्रों के अचेतन मन के एवं रिक्तता को
दर्शाने के लिए सम्यक भाषा का प्रयोग किया गया है । मन्नूजी के निरूपण में
मनोवैज्ञानिकता तथा मनो विश्लेषणात्मक दृष्टि दिख पड़ती है और भाषा में प्रवाहिता।
डॉ. सुरेश सिन्हा ने आपका बंटी'
का
मूल्याकंन करते हुए कहा है - "इस उपन्यास में भावाभिव्यंजना की सूक्ष्मतः एवं
भाषा की नई अर्थवत्ता का सौंदर्य,
जिसकी
विशेष चर्चा होनी चाहिए। इधर कम ही उपन्यास ऐसे है जिनमें चमत्कारों एवं कृत्रिम
दुर्बोधता से बचकर आज की जिंदगी को चित्रों की भाषा और सार्थक प्रतीकों के माध्यम
से प्रस्तुत किया गया है। लेखिका की सजग दृष्टि, परिवेश की यथार्थता पर बराबर के न्द्रित रही है और उसे वह
बड़ी सजीवता से सफलता पूर्वक प्रस्तुत कर सकी है; यह निर्विवाद है।
'आपका बंटी' उपन्यास के बारे में विद्वानगण अपने
अलग-अलग दृष्टिकोण व्यक्त करते हैं। डॉ. मनमोहन सहगऊ ने अपना इस ‘हिन्दी उपन्यास के पदचिन्ह' के अन्तर्गत उल्लेखनीय स्थान प्रदान किया
है। एवं खुद मनोवैज्ञानिक कथाकार जैनेन्द्र कुमार ने भी इस उपन्यास की काफी
प्रशंसा की। लेकिन डॉ. इन्द्रनाथ मदान यह मत है कि 'आपका बंटी'
में
आधुनिकता की पहचान करना संगत भी है या नहीं। डॉ. मदान के अनुसार -'एक तरफ यह उपन्यास आँसुओं से गीला लगता है, भावुकता से भीगा लगता है और दूसरी तरफ बंटी, मां और बाप दोनों से कट कर मिसकिट होने का
बोध कराता है। ..... बंटी की समस्या मानवीय है; लेकिन इस समस्या को निभाने में या उपन्यास का रूप देने में
मन्नू भंडारी का लेखक और माँ इतने घुलमिल जाते हैं कि लेखक की दृष्टि माँ की ममता
से गीली होकर धुंधली पड़ जाती है,
तटस्थ
नहीं रहती, भावुकता की
धारा बार-बार फूटने लगती है। कहींकहीं आधुनिकता के संकेत भी मिल जाते हैं जो इस
धारा में बह जाते हैं।"
इन सभी विद्वानों ने 'आपका बंटी' के बारे में अपने अलग-अलग मत प्रकट किये
है। लेकिन मेरा मानना है कि यह उपन्यास एक नयी बात, नये विचार,
नयी
भाषा, नया भाव-बोध लेकर
आनेवाला हिन्दी का पहला सशक्त उपन्यास है । इस उपन्यास को पढ़ना शुरू करते हैं तो
पूरा न हो जाय तब तक हमें बेचैन करता है और नयी विचारधारा, नये दृष्टिकोण की ओर माता-पिता, पति-पत्नी को भविष्य में आने वाली चुनौती
के लिए सोचने पर मजबूर करता है। किसी भी कथाकार के सभी पहलू सशक्त नहीं होते । इस
कारण कुछ निर्बलताओं के बावजूद 'आपका बंटी' उपन्यासकला की दृष्टि से भी निर्विवाद रूप
से एक सफल उपन्यास है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें