Q.-विद्योत्तमा की शादी कालिदास से क्यों
करवाना चाहते थे?
ANS-उनकी शादी विद्योत्तमा नाम की राजकुमारी
से हुई। ऐसा कहा जाता है कि विद्योत्तमा ने प्रतिज्ञा की थी कि जो कोई उसे
शास्त्रार्थ में हरा देगा,
वह
उसी के साथ शादी करेगी। जब विद्योत्तमा ने शास्त्रार्थ में सभी विद्वानों को हरा
दिया तो अपमान से दुखी कुछ विद्वानों ने कालिदास से उसका शास्त्रार्थ कराया।लिदास
के बारे में कथाओं और किम्वादंतियों से ये पता चलता है की वह शक्लो-सूरत से सुंदर
थे और विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों में एक थे। कहा जाता है कि प्रारंभिक
जीवन में कालिदास अनपढ़ और मूर्ख थे।विद्योतमा नाम की एक राजकुमारी बहुत विद्वान
थी। उसने घोषणा की थी कि जो पुरुष मुझे शास्त्रार्थ में हरा देगा उसी के साथ मैं
शादी करूँगी, अन्य किसी के
साथ नहीं। इस रूप लावण्यवती विद्वान राजकुमारी को प्राप्त करने के लिए कितने ही
राजकुमार आये। अब राजकुमार क्या शास्त्रार्थ करेंगे ! अपना सा मुँह लेकर वापस लौट
गये। विद्वानों के युवान पुत्र भी शास्त्रार्थ करने आये लेकिन राजकुमारी ने सब को
हरा दिया।
सब थके। विद्वान पण्डितों के पुत्र भी
अपमानयुक्त पराजय पाकर आये यह देखकर पण्डितों के अहं को चोट लगी। उनको गुस्सा आया
किः “एक कन्या ने, अबला स्त्री ने हमारे पुत्रों को हरा दिया
! उस राजकुमारी को हम सब सबक सिखाकर ही रहेंगे।”सब पण्डितों ने मिलकर एक षडयन्त्र रचा। निर्णय किया कि उस
गर्वित राजकुमारी की शादी किसी मूर्ख के साथ करा दें तभी हम पण्डित पक्के।
उन्होंने खोज लिया एक मूर्ख…. महामूर्ख। पेड़ पर चढ़कर जिस डाल पर खड़ा
था उसी डाल को उसके मूल से काट रहा था। उससे बड़ा मूर्ख और कौन हो सकता है? पण्डितों ने सोचा कि यह दूल्हा ठीक है।
राजकुमारी की शादी इसके साथ करा दें। उन्होंने उससे कहाः “हम तेरी शादी राजकुमारी के साथ करा देते
हैं लेकिन एक शर्त है। तुम्हें मौन रहना होगा। कुछ बोलना नहीं। बाकी हम सब संभाल
लेंगे।”
विद्वानों की सभा में मूर्खों का मौन ही
उचित है… पण्डित लोग उस मूर्ख को ले गये। एक विद्वान के योग्य वस्त्र
पहना दिये। जो कुछ वेशभूषा करनी थी,
करा
दी। उसे बड़ा मौनी गुरु होने का ढोंग रचा कर राजकुमारी के पास ले गये और कहाः “हमारे गुरु जी आपके साथ शास्त्रार्थ करना
चाहते हैं, परन्तु वे मौन
रहते हैं। आप में हिम्मत हो तो मौन इशारों से प्रश्न पूछो और इशारों से दिये जाने
वाले उत्तर समझो। उनके साथ यदि शास्त्रार्थ नहीं करोगी तो हम समझेंगे कि तुम कायर
हो।”
राजकुमारी के लिए यह चुनौती थी। उसको हाँ
कहना पड़ा। पण्डितों की सभा मिली। इस अभूत पूर्व शास्त्रार्थ देखने सुनने के लिए
भीड़ इकट्ठी हो गई। पण्डित लोग इन मौनी गुरु के कई शिष्य होने का दिखावा करके उनको
मानपूर्वक सभा में ले आये और ऊँचे आसन पर बिठा दिया।
बिना वाणी का शास्त्रार्थ शुरु हुआ।
राजकुमारी ने गुरु जी को एक उँगली दिखाई। गुरु जी समझे कि यह राजकुमारी मेरी एक
आँख फोड़ देना चाहती है। उन्होंने बदले में दो उँगलियाँ दिखाई कि तू मेरी एक
फोड़ेगी तो मैं तेरी दो फोड़ूँगा।
पण्डितों ने अपने गुरुजी की भाषा का
अर्थघटन करते हुए राजकुमारी से कहाः “आप कहते हैं कि
ईश्वर एक है हमारे गुरु जी कहते हैं कि एक ईश्वर से यह जगत नहीं बनता। ईश्वर और
ईश्वर की शक्ति माया, पुरुष और
प्रकृति इन दो से जगत भासता है।”
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